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गांजा, एक वरदान।

गांजा, एक वरदान।

मित्रों, गांजा सिर्फ एक प्राकृतिक औषधी ही नहीं वरन् मनुष्य को अध्यात्म से जोड़ने वाला एक अद्वितीय आयाम भी है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इसकी मान्यता सर्वोपरि है तथा शास्त्रों में इसे सिद्धा, सोम, दर्भ, विजया, भांग और भी कई विविध नामों से पुकारा गया है। ऋग्वेद में भी इसे देवों के राजा इन्द्र का प्रिय भोजन कहा गया है। कई आध्यात्मिक कार्यों तथा विशेष अनुष्ठान कार्यों के पूर्व गांजे के धूम्रपान करने का उल्लेख शास्त्रों में लिखित है। 

यही नहीं, पूर्वकाल में योद्धा जब युद्ध लड़ने जाते थे तो उन्हें सिद्ध गांजे का धूम्रपान करना होता था जिससे उन्हें अद्वितीय शारीरिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक क्षमता मिलती थी और वे युद्ध में साहसिक प्रदर्शन कर विजय प्राप्त कर लेते थे और जो योद्धा घायल हो जाते उनके प्राथमिक व मुख्य उपचार के लिए गांजा उपयोगी था।

आयुर्वेद में गांजे को वरदान कहा गया है जिससे वात, पित्त, कफ इत्यादि के असंतुलन से उत्पन्न सभी सामान्य से सामान्य रोग, तनाव, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, बुखार, एलर्जी, सभी प्रकार के दर्द, दाद, खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी, अन्य चर्म-रोग, केश संबंधित रोग, उदर रोग, नेत्र रोग से लेकर कई गंभीर बीमारियां जैसे मिर्गी, क्षयरोग(कैंसर), रक्तचाप, हृदयाघात, हड्डी रोग, गुप्त रोग, नपुंसकता, मानसिक रोग, अपंगता, हार्मोनल असंतुलन व अन्य कई रोगों का शत-प्रतिशत उपचार है।

विद्यार्थी, कलाकार, आध्यात्मिक व्यक्ति, व्यापारी, योद्धा, श्रमिक व अन्य कई तरह से क्षेत्रों से जुड़े लोगों को गांजे के नियमित सेवन से विशेष लाभ प्राप्त होता है। इसे सेवन करने वाले के बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होती है और मानसिक संतुलन स्थिर होता है। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में सर्वोच्च पद प्राप्त करते हैं।

वर्तमान में कई षड्यंत्रों के कारण गांजे को आज एक नशे अथवा विनाश के रूप में देखा जाता है। यही नहीं, लोग इसका नाम तक लेने से डरते है जैसे यह कोई खतरनाक शस्त्र हो। गांजा पीने वाले व्यक्ति को गंजेड़ी, भंगेड़ी, चरसी, नशेड़ी और भी ना जाने क्या-क्या कह कर संबोधित किया जाता है। यदि कोई गांजा पीता दिख जाए तो समाज में उसका उपहास उड़ाया जाता है जबकि इसके विपरीत तंबाकू और शराब पीने वाले व्यक्ती को समाज एक आदर्श के रूप में देखता है। परंतु वास्तविकता इसके विपरीत है जिसे अधिकांश लोग नहीं जानते व समझते।

आधुनिकता के इस कालखंड में लोग मानसिक रूप से अंधे हो चुके है। कल का भारत(देवभूमि) आज इंडिया (मुर्ख/असभ्य) हो गया जिसके फलस्वरूप यहां के निवासियों में भी मुर्खता ने स्थान ले लिया और आज भारत को इंडिया कहने वाला व्यक्ति पश्चिमी विचारधारा की मानसिकता में खो गया। उन्हें यह तनिक भी ज्ञात नहीं है कि विदेशी आक्रांताओं द्वारा हमारी सनातन संस्कृति के साथ कितना खिलवाड़ किया गया और ना उनकी मानसिकता रही कि वे इन विषयों पर विचार-विमर्श करें या समझने का प्रयास करें।

वे भले ही विचार न करें परंतु मेरा लोगों को जागरूक करने का प्रयास निरंतर गतिशील रहेगा। मुझे विश्वास है कि आपको उपरोक्त सभी बातें समझ आ गई होगी क्योंकि आप तो भारतीय संस्कृति से जुड़े हो। तो इसलिए मुझसे जुड़े रहे और मेरे द्वारा संगठित महत्वूर्ण जानकारियों को अपने लोगों के साथ भी अवश्य साझा करे जिसके फलस्वरूप हम भारत की रूपरेखा को पुनः जागृत कर सके।



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आभार: Roshan Narnoli.✍🏻

लेखक, गांजा शोधकर्ता, शिक्षक, 

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By ROSHAN NARNOLI,

Cannabis activist, Researcher, Educator and Blogger.



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