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Showing posts from September, 2020

उत्तराखंड में 200 साल पुराना है औद्योगिक भांग आधारित उद्यमिता का इतिहास।

आज परहेज क्यों? पर्वतीय क्षेत्रों में 1910 से पूर्व अंग्रेजों के जमाने से अल्मोड़ा और गढ़वाल जिलों (वर्तमान का पौड़ी, चमोली, रूद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़) में रेशे और मसाले के लिए भांग की व्यावसायिक खेती की अनुमति का प्रावधान कानून में है। पुरातन समय में जब जूते, चप्पलों का प्रचलन नहीं था, तब भेड़-बकरी पालक और तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले लोग- भेड़-बकरी की खाल से बने जूतों के बाहर भांग की रस्सी से बुने गये छपेल का प्रयोग करते थे। ऐसे जूते पांव को गर्म तो रखते ही थे साथ ही बर्फ में फिसलने से रोकते थे। भेड़-बकरियों की पीठ पर माल ढोने के लिए भांग के रेशों से बनाये गये थैले भी पुराने समय में प्रचलन में थे।   उत्तराखण्ड के स्थानीय संसाधनों का वर्णन करते हुए पुरातन ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों जैसे परम्परागत फसलें, प्राकृतिक रेशे डांस कण्डाली, भांग और अन्य रेशों के बारे में उद्घृत करते हैं। इन्हीें में से एक गढ़वाल हिमालय के गजेटियर में वर्णन किया गया है-   1910 में छपे ब्रिटिश गढ़वालगजेटियर में लेखक एच0जी0वाल्टन लिखते हैं- चंदपुर में निचले वर्ग के खसिया-पबिला अब भा...